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शनिदेव जयंती पर शनि मंदिर में उमड़ी भक्तों की भीड़

शनिदेव जयंती पर शनि मंदिर में उमड़ी भक्तों की भीड़

दंतेवाड़ा। 

सृष्टि को गर्मी प्रदान करने वाले सूर्यदेव के पुत्र शनिदेव महाराज जी का अवतरण दिवस है। इस उपलक्ष्य में आज नगर स्थित शनि मंदिर में सुबह से ही भक्तों की अपार भीड़ देखी गई। शनिदेव जी की जंयती के शुभ अवसर पर आज मंदिर में विविध धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। आज सुबह शुभ मुहुर्त में शनिदेव जी का विशेष अभिषेक, पूजन एवं आरती की गई। शाम को महाभंडारा प्रसाद वितरण किया जाएगा।

गौरतलब है कि हर वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि तिथि को शनिदेव जी का जन्मोत्सव श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी नगर स्थित शनि मंदिर में धूमधाम के साथ शनिदेव जी की जयंती मनाई जा रही है। भगवान की जयंती से एक दिन पूर्व सोमवार शाम को भगवान शनिदेव जी को फूलों से सुसज्जित वाहन में बैठकर नगर भ्रमण करवाया गया।  पूरे नगर का एक चक्कर लगाने के पश्चात शनिदेव महाराज जी वापस देर शाम अपने धाम पहुंचे। नगर भ्रमण के दौरान भक्तों ने शनिदेव जी के दर्शन कर अपने को धन्य किया। भगवान के वापसी पर शनिदेवजी को भोग चढ़ाकर विशेष पूजा आरती की गई। आज कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि है और आज ही सूर्यपुत्र भगवान शनिदेव जी की जयंती है। शनिदेव को न्याय का देवता माना गया है, जो मनुष्यों को उनके कर्मो के अनुरूप फल प्रदान करते हैं। ऐसी मायता है कि शनि जयंती के दिन विधि विधान  से पूजा अर्चना करने पर शनि दोष, शनि की साढेसाती, और ढैया जैसे विभिन्न कष्टों से राहत मिलती है। भगवान के अवतरण दिवस पर आज सुबह 6 बजे शनिदेव जी का दूध, दही, शहद, घी, पचामृत, तिल के तेल एवं गंगाजल से अभिषेक किया गया।

अभिषेक पश्चात भगवान को 32 दीपों की महाआरती की गई। सुबह 9 बजे से शनि मंदिर में मंदिर समिति द्वारा सुंदरकाड, हनुमान चालीसा, सत्संग  पाठ किया गया। हवन उपरांत पूर्णाहुति की गई। आज संध्या पहर मंदिर में महाभंडारा प्रसाद वितरण  किया जाएगा। मंदिर के मुख्य पुजारी विभूति भूषण मिश्र ने बताया कि ज्येष्ठ मास की अमावस्या को भगवान श्री शनिदेव जी का अवतरण  हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार इनका जन्म सूर्यदेव की दूसरी पत्नि छाया से हुआ था। शनिदेव जब मां के गर्भ में थे तब मां छाया भगवान शिव की घोर तपस्या में लीन थी। छाया के तप के प्रभाव से गर्भस्थ शिशु शनि भी जन्म लेने के पश्चात शिव भक्ति में लीन रहने लगे। एक दिन उन्होंने सूर्यदेव से कहा कि पिताश्री मैं हर मामले में आपसे सात गुना यादा रहना चाहता हूं यहां तक कि आपके मंडल से मेरा मण्डल सात गुना अधिक हो, मुझे आपसे सात गुना अधिक शक्ति प्राप्त हो, मेरे वेग का कोई सामना न कर सके। चाहे वह वेग, देव, असूर, दानव, या सिद्ध साधक ही क्यों न हो। आपके लोक से मेरा लोक सात गुना उंचा रहे। मुझे मेरे आराध्य देव श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन हो और मैं भक्ति ज्ञान से पूर्ण हो जाउं। पुत्र शनि के श्रद्धा एवं निष्ठा से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें अविमुक्त क्षेत्र काशी जाने और वहीं शिव की आराधना करने का परामर्श दिया। शनिदेव काशी गए और शिव आराधना करने लगे। तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी प्रकट हुए और उन्होने ग्रहों में सर्वोपरि स्थान तो दिया ही साथ ही मृत्युलोक का न्यायधीश भी नियुक्त किया। उन्हें साढेसाती और ढैया का वरदान दिया। साढेसाती की अवधि सत्ताईश सौ दिन और ढैया की अवधि नौ दिन नियत की तब से लेकर आज तक शनिदेव की ढैया और साढेसाती को दंडस्वरूप समझा जाता है। पिता सूर्य ने शनिदेव जी को मकर और कुंभ राशि के साथ अनुराधा, पुष्य और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र का अधिपति भी बनाया। शनिदेव जी ने जिस शिवलिंग की स्थापना की वही आज नौवें ज्योर्तिलिंग श्रीकाशीविश्वनाथ के नाम से प्रसिद्ध है।

Uditbharatnews News

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