उन्होंने भागवत कथा की आध्यात्मिक महत्ता को समझाते हुए कहा, "भागवत कथा कोई मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि एक यज्ञ है, जिसे पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से ग्रहण करना चाहिए। यह जीवन की सारी व्यथाओं को हर लेती है और आत्मा को शुद्ध बनाकर मोक्ष का द्वार खोलती है।"
पं. पवन चतुर्वेदी ने धुंधकारी की कथा का उदाहरण देते हुए बताया कि "ब्राह्मण होते हुए भी वह घोर नास्तिक था, भोगविलासी था, जिसका परिणाम यह हुआ कि मृत्यु के बाद वह प्रेत बना। तब उसे अहसास हुआ कि श्रीमद् भागवत कथा ही वह ज्ञान गंगा है, जो आत्मा को पवित्र करती है और उसे परमात्मा से मिलाने का मार्ग दिखाती है।"
कथा के दौरान श्रद्धालु भावविभोर होकर भजन-कीर्तन में लीन रहे। वातावरण पूर्ण रूप से भक्तिमय हो गया। पं. पवन चतुर्वेदी के ओजस्वी वचनों ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि "भागवत कथा के पहले और बाद में भी मन को स्थिर रखें, और भौतिकता की बजाय आध्यात्मिकता से जुड़ने का प्रयास करें।
इस पावन आयोजन ने समस्त श्रद्धालुओं को जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर उन्मुख किया और उन्हें सत्संग के महत्व से परिचित कराया।