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जल: जीवन का अमृत, संरक्षण ही हमारा धर्म - डॉ. गीता सिंह जल संरक्षण

जल: जीवन का अमृत, संरक्षण ही हमारा धर्म - डॉ. गीता सिंह जल संरक्षण

आज पूरी दुनिया में जल संकट भयावह रूप ले चुका है। भारत में भी कई क्षेत्र पानी की कमी से जूझ रहे हैं। राजस्थान और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में पानी के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है, जबकि महानगरों में गिरता भूजल स्तर चिंताजनक है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पृथ्वी पर मौजूद जल का मात्र 2.5% हिस्सा पीने योग्य है, जिसका अधिकांश भाग ग्लेशियरों में जमा है। इसके बावजूद जल संरक्षण को लेकर हमारी लापरवाही जारी है।

बचपन की यादें और वर्तमान स्थिति :
एक समय था जब गांवों में बच्चे तालाबों में किलकारियां मारते थे, कुएं का ठंडा पानी पीते थे और दादी-नानी गंगा-यमुना की पवित्रता का बखान करती थीं। लेकिन आज सूखते जलस्रोत, दूषित नदियां और गिरता भूजल स्तर एक भयावह भविष्य की ओर इशारा कर रहे हैं।

जल संरक्षण: हमारा उत्तरदायित्व
जल संकट को रोकने के लिए हमें व्यक्तिगत स्तर पर जिम्मेदारी लेनी होगी:

जल की बर्बादी रोकें: ब्रश करते समय नल बंद रखें, बर्तन धोते समय बहते पानी का अपव्यय न करें।

वर्षा जल संचयन करें: बारिश के पानी को संग्रहित कर भूजल स्तर को बढ़ाएं।

पुनर्चक्रण अपनाएं: घरों और उद्योगों में पानी का दोबारा इस्तेमाल करें।

जल प्रदूषण पर रोक: नदियों और झीलों में कचरा, प्लास्टिक या रसायन न डालें।

वृक्षारोपण करें: पेड़ भूजल स्तर को बनाए रखने में सहायक होते हैं।

जल दिवस: संकल्प लेने का अवसर
विश्व जल दिवस केवल एक दिन जल संरक्षण की बात करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह हमें अपने दैनिक जीवन में जल बचाने की आदत विकसित करने की प्रेरणा देता है।

आइए, हम संकल्प लें कि जल को व्यर्थ नहीं बहाएंगे, इसे प्रदूषित होने से बचाएंगे और आने वाली पीढ़ियों को जल संपदा का उपहार देंगे। याद रखें, "जल ही जीवन है"— यह महज नारा नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई है।

Uditbharatnews News

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